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Tuesday, 3 September 2013

भगतसिंह (1925)

युवक!


['युवक!’ शीर्षक से नीचे दिया गया भगतसिंह का यह लेख ‘साप्ताहिक मतवाला’ (वर्ष : 2, अंक सं. 36, 16 मई, 1925) में बलवन्तसिंह के नाम से छपा था। इस लेख की चर्चा ‘मतवाला’ के सम्पादकीय कर्म से जुड़े आचार्य शिवपूजन सहाय की डायरी में भी मिलती है। लेख से पूर्व यहाँ'आलोचना’ में प्रकाशित डायरी के उस अंश को भी उद्धृत किया जा रहा है।- स.]

सन्ध्या समय सम्मेलन भवन के रंगमंच पर देशभक्त की स्मृति में सभा हुई। ... भगतसिंह ने ‘मतवाला’ (कलकत्ता) में एक लेख लिखा था : जिसको सँवार-सुधार कर मैंने छापा था और उसे पुस्तक भण्डार द्वारा प्रकाशित ‘युवक साहित्य’ में संगृहीत भी मैंने ही किया था। वह लेख बलवन्तसिंह के नाम से लिखा था। क्रांतिकारी लेख प्राय: गुमनाम लिखते थे। यह रहस्य किसी को ज्ञात नहीं। वह लेख युवक-विषयक था। वह लाहौर से उन्होंने भेजा था। असली नाम की जगह ‘बलवंत सिंह’ ही छापने को लिखा था।
(आचार्य शिवपूजन सहाय की डायरी के अंश, 23 मार्च, पृष्ठ 28, आलोचना-67/वर्ष 32/अक्तूबर-दिसंबर, 1983)
युवावस्था मानव-जीवन का वसन्तकाल है। उसे पाकर मनुष्य मतवाला हो जाता है। हजारों बोतल का नशा छा जाता है। विधाता की दी हुई सारी शक्तियाँ सहस्र धारा होकर फूट पड़ती हैं। मदांध मातंग की तरह निरंकुश, वर्षाकालीन शोणभद्र की तरह दुर्द्धर्ष,प्रलयकालीन प्रबल प्रभंजन की तरह प्रचण्ड, नवागत वसन्त की प्रथम मल्लिका कलिका की तरह कोमल, ज्वालामुखी की तरह उच्छृंखल और भैरवी-संगीत की तरह मधुर युवावस्था है। उज्जवल प्रभात की शोभा, स्निग्ध सन्ध्या की छटा, शरच्चन्द्रिका की माधुरी ग्रीष्म-मध्याह्न का उत्ताप और भाद्रपदी अमावस्या के अर्द्धरात्र की भीषणता युवावस्था में निहित है। जैसे क्रांतिकारी की जेब में बमगोला, षड्यंत्री की असटी में भरा-भराया तमंचा, रण-रस-रसिक वीर के हाथ में खड्ग, वैसे ही मनुष्य की देह में युवावस्था। 16 से 25 वर्ष तक हाड़- चाम के सन्दूक में संसार-भर के हाहाकारों को समेटकर विधाता बन्द कर देता है। दस बरस तक यह झाँझरी नैया मँझधार तूफान में डगमगाती तहती है। युवावस्था देखने में तो शस्यश्यामला वसुन्धरा से भी सुन्दर है, पर इसके अन्दर भूकम्प की-सी भयंकरता भरी हुई है। इसीलिए युवावस्था में मनुष्य के लिए केवल दो ही मार्ग हैं- वह चढ़ सकता है उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर, वह गिर सकता है अध:पात के अंधेरे खन्दक में। चाहे तो त्यागी हो सकता है युवक, चाहे तो विलासी बन सकता है युवक। वह देवता बन सकता है, तो पिशाच भी बन सकता है। वही संसार को त्रस्त कर सकता है, वही संसार को अभयदान दे सकता है। संसार में युवक का ही साम्राज्य है। युवक के कीर्तिमान से संसार का इतिहास भरा पड़ा है। युवक ही रणचण्डी के ललाट की रेखा है। युवक स्वदेश की यश-दुन्दुभि का तुमुल निनाद है। युवक ही स्वदेश की विजय-वैजयंती का सुदृढ़ दण्ड है। वह महाभारत के भीष्मपर्व की पहली ललकार के समान विकराल है, प्रथम मिलन के स्फीत चुम्बन की तरह सरस है, रावण के अहंकार की तरह निर्भीक है, प्रह्लाद के सत्याग्रह की तरह दृढ़ और अटल है। अगर किसी विशाल हृदय की आवश्यकता हो, तो युवकों के हृदय टटोलो। अगर किसी आत्मत्यागी वीर की चाह हो, तो युवकों से माँगो। रसिकता उसी के बाँटे पड़ी है। भावुकता पर उसी का सिक्का है। वह छन्द शास्त्र से अनभिज्ञ होने पर भी प्रतिभाशाली कवि है। कवि भी उसी के हृदयारविन्द का मधुप है। वह रसों की परिभाषा नहीं जानता,पर वह कविता का सच्चा मर्मज्ञ है। सृष्टि की एक विषम समस्या है युवक। ईश्वरीय रचना-कौशल का एक उत्कृष्ट नमूना है युवक। सन्ध्या समय वह नदी के तट पर घण्टों बैठा रहता है। क्षितिज की ओर बढ़ते जानेवाले रक्त-रश्मि सूर्यदेव को आकृष्ट नेत्रों से देखता रह जाता है। उस पार से आती हुई संगीत-लहरी के मन्द प्रवाह में तल्लीन हो जाता है। विचित्र है उसका जीवन। अद्भुत है उसका साहस। अमोघ है उसका उत्साह।
वह निश्चिन्त है, असावधान है। लगन लग गयी है, तो रात-भर जागना उसके बाएं हाथ का खेल है, जेठ की दुपहरी चैत की चांदनी है, सावन-भादों की झड़ी मंगलोत्सव की पुष्पवृष्टि है, श्मशान की निस्तब्धता, उद्यान का विहंग-कल कूजन है। वह इच्छा करे तो समाज और जाति को उद्बुद्ध कर दे, देश की लाली रख ले, राष्ट्र का मुखोज्ज्वल कर दे, बड़े-बड़े साम्राज्य उलट डाले। पतितों के उत्थान और संसार के उद्धारक सूत्र उसी के हाथ में हैं। वह इस विशाल विश्व रंगस्थल का सिद्धहस्त खिलाड़ी है।
अगर रक्त की भेंट चाहिए, तो सिवा युवक के कौन देगा ?अगर तुम बलिदान चाहते हो, तो तुम्हें युवक की ओर देखना पड़ेगा। प्रत्येक जाति के भाग्यविधाता युवक ही तो होते हैं। एक पाश्चात्य पंडित ने ठीक ही कहा है- It is an established truism that youngmen of today are the countrymen of tomorrow holding in their hands the high destinies of the land. They are the seeds that spring and bear fruit. भावार्थ यह कि आज के युवक ही कल के देश के भाग्य-निर्माता हैं। वे ही भविष्य के सफलता के बीज हैं।
संसार के इतिहासों के पन्ने खोलकर देख लो, युवक के रक्त से लिखे हुए अमर सन्देश भरे पड़े हैं। संसार की क्रांतियों और परिवर्तनों के वर्णन छाँट डालो, उनमें केवल ऐसे युवक ही मिलेंगे,जिन्हें बुद्धिमानों ने ‘पागल छोकड़े’ अथवा ‘पथभ्रष्ट’ कहा है। पर जो सिड़ी हैं, वे क्या ख़ाक समझेंगे कि स्वदेशाभिमान से उन्मत्त होकर अपनी लोथों से किले की खाइयों को पाट देनेवाले जापानी युवक किस फौलाद के टुकड़े थे। सच्चा युवक तो बिना झिझक के मृत्यु का आलिंगन करता है, चौखी संगीनों के सामने छाती खोलकर डट जाता है, तोप के मुँह पर बैठकर भी मुस्कुराता ही रहता है, बेड़ियों की झनकार पर राष्ट्रीय गान गाता है और फाँसी के तख्ते पर अट्टहासपूर्वक आरूढ़ हो जाता है।फाँसी के दिन युवक का ही वजन बढ़ता है, जेल की चक्की पर युवक ही उद्बोधन मन्त्र गाता है,कालकोठरी के अन्धकार में धँसकर ही वह स्वदेश को अन्धकार के बीच से उबारता है। अमेरिका के युवक दल के नेता पैट्रिक हेनरी ने अपनी ओजस्विनी वक्तृता में एक बार कहा था- Life is a dearer outside the prisonwalls, but it is immeasurably dearer within the prison-cells, where it is the price paid for the freedom’s fight. अर्थात् जेल की दीवारों से बाहर की जिन्दगी बड़ी महँगी है,पर जेल की काल कोठरियो की जिन्दगी और भी महँगी है क्योंकि वहाँ यह स्वतन्त्रता-संग्राम के मूल्य रूप में चुकाई जाती है।
जब ऐसा सजीव नेता है, तभी तो अमेरिका के युवकों में यह ज्वलन्त घोषणा करने का साहस भी है कि, “We believe that when a Government becomes a destructive of the natural right of man, it is the man’s duty to destroy that Government."अर्थात् अमेरिका के युवक विश्वास करते हैं कि जन्मसिद्ध अधिकारों को पद-दलित करने वाली सत्ता का विनाश करना मनुष्य का कर्तव्य है।
ऐ भारतीय युवक! तू क्यों गफलत की नींद में पड़ा बेखबर सो रहा है। उठ, आँखें खोल, देख, प्राची-दिशा का ललाट सिन्दूर-रंजित हो उठा। अब अधिक मत सो। सोना हो तो अनंत निद्रा की गोद में जाकर सो रह। कापुरुषता के क्रोड़ में क्यों सोता है? माया-मोह-ममता का त्याग कर गरज उठ-
“Farewell Farewell My true Love
The army is on move;
And if I stayed with you Love,
A coward I shall prove.”
तेरी माता, तेरी प्रात:स्मरणीया, तेरी परम वन्दनीया, तेरी जगदम्बा, तेरी अन्नपूर्णा, तेरी त्रिशूलधारिणी, तेरी सिंहवाहिनी, तेरी शस्यश्यामलांचला आज फूट-फूटकर रो रही है। क्या उसकी विकलता तुझे तनिक भी चंचल नहीं करती? धिक्कार है तेरी निर्जीवता पर! तेरे पितर भी नतमस्तक हैं इस नपुंसकत्व पर! यदि अब भी तेरे किसी अंग में कुछ हया बाकी हो, तो उठकर माता के दूध की लाज रख, उसके उद्धार का बीड़ा उठा, उसके आँसुओं की एक-एक बूँद की सौगन्ध ले, उसका बेड़ा पार कर और बोल मुक्त कण्ठ से- वंदेमातरम्।

Date Written: 1925
Author: Bhagat Singh
Title: Youth (Yuvak)
First Published: in Saptahik Matwala, Vol.2 ; No. 38, dated May 16, 1925.

Saturday, 24 August 2013

झारखंड में भी अंधविश्वास पर हल्ला बोल

कार्य करने में अंतर जरूर है, लेकिन मकसद एक ही है, लोगों को जागरूक करना
वन देवी की आड़ में लोगों की बलि के पीछे के यथार्थ का पर्दाफाश 
प्रणव प्रियदर्शी
रांची। अंधविश्वास के खिलाफ लड़नेवाले नरेंद्र दाभोलकर की पुणे में हत्या के बाद पूरा देश आंदोलित है। लेकिन यह बहुत कम को पता है कि झारखंड में भी युवाओं की एक ऐसी टोली ऐसी है, जो अंधविश्वास के खिलाफ रणभेड़ी बजायी हुई है। इनके कार्य करने में अंतर जरूर है, लेकिन मकसद एक ही है, जागरूक करना। इस टोली में पांच सदस्य हैं। ये सभी ह्यझारखंड पारानार्मल सोसाइटीह्ण से जुड़े हुए हैं। यह संस्था अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका निभा रही है। विदित हो कि जीटीवी पर प्रसारित होनेवाले फियर फाइल की शरुआती तीन महीने के एपिसोड के लिए इनकी रिसर्च टीम व स्टोरी का सहारा लिया जा चुका है। सोनी टीवी पर भी इसीतरह की एक सीरियल आनेवाली है, जिसमें भी इनका काम हो रहा है। पारानार्मल (असामान्य, अलौकिक) से संबंधित जब कोई मामला इनके पास पहुंचता है, पूरी टीम वहां पहुंचती है। अपने यूनिक रिसर्च बाक्स के साथ घटना की तह तक जाती है। पूरे घटनाक्रम को बगैर किसी तर्क और बतकही के प्रमाणिकता के साथ लोगों के समक्ष रखा जाता है। जिससे सहज ही इन्हें  विश्वास हासिल हो जाता है।
        बहुत दिन नहीं हुए हैं, जब चाईबासा के सारंडा में डुम्भीशाही पहाड़ पर वन देवी की आड़ में लोगों की बलि के पीछे के यथार्थ का इन्होंने पर्दाफाश किया। यहां यह विश्वास कायम था कि हर वर्ष गोवर्धन पूजा के दौरान लगनेवाले मेले में वन देवी एक की बलि लेती है। सालों से ऐसा ही होता आ रहा था। आश्चर्य तो ये है कि इस मामले पर कोई पुलिस केस भी दर्ज नहीं किया जाता था। जहां लाश मिलती थी, लोग उस जगह पर दिन में भी जाने से कतराते थे। टीम बेझिझक वहां पहुंची और अपने रिसर्च के माध्यम से यह साबित किया कि वन देवी किसी की बलि नहीं लेती। यह किसी अपराधी गिरोह के सक्रिय होने की नुमाइंदगी है। गांव के लोगों ने रिसर्च को सराहा और अगली बार से सतर्क रहने का आश्वासन दिया। ऐसे कई छोटी-बड़ी व्यक्तिगत व सामूहिक समस्याओं पर इन्होंने काम किया है। कई लोगों की जिंदगियों को नव विहान से संपृक्त किया है।
       

भारत में यह संस्था 2009 से कार्य कर रही है, जबकि झारखंड में 2012 से सक्रिय है। भारत में ह्यइंडीयन पारानार्मल सोसाइटीह्ण नाम से चर्चित संस्था को लाने का श्रेय गौरव तिवारी को जाता है, जो कई राज्यों में संचिालित है। इसी से आबद्ध झारखंड में ह्यझारखंड पारानार्मल सोसाइटीह्ण शिशिर कुमार के संचालन में कार्य कर रहा है। इन्होंने अपनी पढ़ाई पारानार्मल से संबंधित विषय को लेकर आइएमएचएस, अमेरिका से भी की है। इस विषय से एम.ए. कर चुके हैं। फिलहाल पीएचडी की तैयारी में लगे हैं। इनसे झारखंड में आदेश कुमार, विद्युत सिंह राय, रंजीत कुमार, सागर मिश्रा और सौरभ जुड़े हुए हैं। इनके रिसर्च बॉक्स में डीजीटल इन्फरारेड थर्मोमीटर, केआइआइ मीटर, डीजीटल इएमएफ मीटर,ओवाइजा बोर्ड, घोस्ट मीटर प्रो आदि उपकरण रहते हैं। जिसके माध्यम से इनर्जी, स्ट्रेंथ, साउण्ड और आभासी दुनिया की हरकतों की पहचान करते हैं। और फिर अपने रिसर्च को अंजाम तक पहुंचाते हैं। 

Wednesday, 14 August 2013

कोई हमें भी बताये देश प्रेम होता है क्या?


प्रणव प्रियदर्शी
स्वतंत्रता दिवस का नाम जेहन में गूंजते ही एक अलग ही रोमांच और खुशी से मन इठला उठता है। ऐसा किस कारण से होता है? कभी सोचा है हमने? स्वतंत्रता शब्द के स्वाद से या फिर दिवस के अनुराग से? स्वतंत्र फिजां में सांस लेने से या फिर किसी त्योहार के आगाज से? रविवार के अलावा सप्ताह में एक और छुप्ती जुड़ने के उत्साह से? वजह कई हो सकते हैं, लेकिन एक वजह शायद ही किसी के मन कुहुक उठती हो। वह ये कि स्वतंत्रता दिवस एक ऐसा महत्वपूर्ण दिन है, जिस दिन हमें मौका मिलता है अपने वीर शहीदों के अनुग्रह में नतमस्तक होने का।
     विडंबना यह है कि नतमस्तक होने पर भी सिर्फ हमारा मस्तक ही झुकता है, मन नहीं झुकता। और मन को झुकाने के लिए हम कोई पहल भी नहीं करते। आखिर करें भी कैसे? क्योंकि हमें न खुद से प्यार है, न अपनी जिंदगी से। जिस आबोहवा में रहते हैं, जिस सरोकार में सांस लेते हैं, उससे न कोई लगाव है। भारतीयता या राष्ट्रवाद क्या होता है, न उस तरफ कोई झुकाव है। हमें न अपनी संस्कृति का कोई मलाल है और न ही अपनी सामाजिक जीवन पद्धति से कोई आकर्षण। हमें अपनी विरासत के प्रति न मोह है और न भविष्य के प्रति कोई दृष्टि। 
       इसी का नतीजा है कि अभी स्वतंत्रता दिवस का समय है और पाकिस्तान ने जम्मु-काश्मीर के पुंछ में षड्यंत्र कर हमारे पांच जवानों की हत्या कर दी। जिसमें चार जवान बिहार के ही थे। पाकिस्तान के प्रति पूरे देश में आक्रोश दिखा। लेकिन बिहार ने सामूहिक रूप से इनके प्रति अनुग्रह का भाव नहीं दिखाया। उनके शव को जब पटना हवाई अड्डे पर लाया गया तो सत्ताधीन सरकार के किसी भी मंत्री को इतनी भी फुर्सत नहीं थी कि उनका सादा स्वागत भी कर पाते। इस कारगुजारी के बारे में जब उनसे पूछा गया तो उल्टे पूछनेवाले पर ही बरस पड़े। आक्रोश में मन का दबा रंग बाहर छिटक ही जाता है। ऐसा हुआ भी। तीन मंत्रियों के छिटके रंग ने सरकार का रंग उतार दिया। वे हमारे ही द्वारा चुने गये प्रतिनिधि हैं। उनके रंग में भी तो हमारा रंग घुला है। वे हमारे ही अच्छे-बुरे रंग का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए उनके दिये गये बयान के मर्ज को अपने मन के तराजू पर भी तौलना जरूरी है। मंत्रियों ने कोई नयी बात नहीं कही। उन्होंने हम सबकी बात कही है। देश प्रेम के नाम पर हमारे-आपके मन में क्या चलता है, उसका भेद खोला है।
      ग्रामीण विकास मंत्री भीम सिंह ने कह डाला- 'जवान शहीद होने के लिए ही होते हैं। लोग सेना और पुलिस में नौकरी क्यों लेते हैं?' भीम सिंह ने भीम की तरह मोटी बात कही। हम साधारण जन में भी क्या शहीदों के लिए ऐसी ही भावना नहीं है? सेना और पुलिस की नौकरी में सभी देश प्रेम से आप्लावित होकर ही तो नहीं जाते। अधिकांश के लिए ऐसी नौकरी देश सेवा नहीं विवशता है। इस तरह की नौकरी में हर समय मौत मौके के इंतजार में खड़ी रहती है, फिर भी रोटी की विवशता उससे टकरा देती है। अगर सिर्फ सेवा भाव से लोग इस ओर जाते तो नौकरी शब्द सेना और पुलिस के लिए अपमानित शब्द होता। 
     इसके बाद बिहार के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह ने पाकिस्तान का पक्ष लिया था। उन्होंने शहीद जवानों के परिजनों के अनशन को नाटक बताया था। क्या हमारे देश में ऐसे लोग नहीं हैं, जो खाते तो इस देश का हैं, लेकिन पक्ष पाकिस्तान का लेते हैं? क्या हमारे देश में अनशन अपने स्वार्थलोलुप इच्छाओं को मनवाने के लिए नहीं किया जाता?
    बात से बात निकली और शहीद जवान प्रेमनाथ सिंह के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होने के बारे में बिहार के विज्ञान व प्रौद्योगिकी मंत्री गौतम सिंह ने कह डाला- 'क्या फर्क पड़ता है।' गौतम बुद्ध तो ये है नहीं कि इनकी बातों को अनासक्ति की साधना से उत्पन्न मध्यमा, बैखरी मान लिया जाता। बुद्ध की जगह सिंह हैं, इसलिए तूफान मचना ही था। लेकिन उन्होंने क्या गलत कहा! जवानों के शहीद होने से देश में कितने लोगों की भावुकता लिरजती है? कितने को फर्क पड़ता है कि इसकी पड़ताल करे कि कबतक सीमा पर हमारे देश के जवान खून बहाते रहेंगे और प्रतिफल कुछ नहीं निकलेगा। जिनसे इनकी उम्मीद की जाती है, वे भी तो दुश्मनों का रहनुमा बन कर बैठे हैं।
      बजाहिर, हमें स्वतंत्रता दिवस एक अवसर प्रदान करता है। एक ऐसा अवसर कि हम विचार कर सकें कि देश प्रेम की भावना हमारे भीतर कैसे पल्लवित-पुष्पित हो सके? कैसे अपने चारों ओर के फूल-पत्तों, भाव-भंगिमा के प्रवाह में सम्मलित होकर अपने प्रेम को विस्तार दे सकें। कैसे हम स्वतंत्रता के मूल्य को समझ कर उसे आत्मसात करने की ओर बढ़ सकें। कि कैसे निढाल होती जिंदगी के बीच मरते सपनों के बीज को फिर से जगा सकें।