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Wednesday, 3 January 2018

शहर बहक चुका है, गांव तुम्हें संभालना होगा

प्रणव प्रियदर्शी
आज शहर और गांव के बीच एक लंबी खाई बन चुकी है. गांव व शहर के बीच एक संतुलन जरूरी है, जो कहीं दिख नहीं रहा है. सारा विकास अगर शहर में सिमट आयेगा, तो गांव कहां जायेगा. क्या गांव सिर्फ बेरोजगार व वृद्धों की कब्रगाह बनेगा. जी हां, हम जिस विकास की आबोहवा में दौड़ लगा रहे हैं, उससे ऐसा ही प्रतीत हो रहा है. यह विकास हमारे जीवन को एकांगी बनाता जा रहा है. 
महात्मा गांधी ने भविष्य की इस अराजकता को अपने समय में ही भांप लिया था. इसलिए उन्होंने ग्राम स्वराज्य पर सबसे अधिक बल दिया था. खादी तो एक बहाना था, इसके माध्यम से वह एक समेकित व दूरदर्शी अर्थव्यवस्था की नींव रखना चाहते थे. मोरहाबादी में आयोजित खादी व सरस मेला ग्रामीण अर्थव्यवस्था की इसी अवधारणा को उजागर कर रहा है. इसमें ग्राम्य जीवन और उसका उद्योग कौन -सा रूप ले सकता है, इसे खूबसूरती से रेखांकित किया गया है.
झारखंड राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष संजय सेठ ने बताया कि इस बार मेला में 1200 स्टाल लगे हैं, जबकि पिछले वर्ष 600 स्टॉल ही लगाये गये थे. इसमें अधिकतर स्टॉल लघु उद्योगों, कारीगरों और छोटे व्यवसायियों के हैं. वहीं, दूसरी ओर मुख्यमंत्री ने भी घोषणा की है कि 32,000 गांवों में विलेज कोर्डिनेटर नियुक्त होंगे, जिसका काम गांव की गरीब महिलाओं को चिह्नित करना और उसे कौशल विकास के कार्यक्रम से जोड़ना होगा. मुख्यमंत्री रघुवर दास ने यह भी कहा है कि 2022 तक हर बीपीएल कार्डधारी के हर सदस्य को स्वरोजगार से जोड़े जाने का प्रयास होगा. पद्मश्री अशोक भगत ने कहा है कि खादी के जरिये गांव के जो पुराने धंधे खत्म हो रहे हैं, वे जीवित होंगे. ये सारी चीजें एक सुखद भविष्य की ओर संकेत कर रही हैं.
महात्मा गांधी का खादी को प्रोत्साहित करने का यही उद्देश्य था कि खादी उद्योग भले ही लोगों की धनवान बनने की उच्च आकांक्षा को न पूरा कर सके, लेकिन गांवों को बेरोजगारी और बेकारी से दूर करेगा. लोगों को स्वालंबी होने का सामर्थ्य प्रदान करेगा. हालांकि उनका खादी आंदोलन यहीं तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने इसके माध्यम से जाति, धर्म और अमीरी-गरीबी की खाई को पाटने का काम किया. समय की मांग है कि खादी के बहाने हस्त शिल्प व पारिवारिक उद्यम को भी बढ़ावा मिले. बाजार पर हमारी अधिक निर्भरता हमारी सेहत के साथ-साथ हमारी मनोभावना को भी प्रदूषित करती है. समय इसका गवाह है.

Monday, 22 May 2017

गांव से गायब होती कीर्तन मंडली

प्रणव प्रियदर्शी

घुप्प अंधेरा, स्तब्ध रात, डग भर की दूरी भी नहीं सूझती थी। कहीं दूर से आती कीर्तन की मद्धिम आवाज कोनों में उतरती थी। मन को यह भरोसा होता था कि कोई है...है कोई ... आसपास उत्साह की आंच सुलगाने के लिए। गांवों की वह सांस्कृतिक परिदृश्य ही उसकी पहचान थी। लेकिन अब वहां कीर्तन मंडली ही नहीं है तो भला कीर्तन कहां से होगा? गांव-घर में जब भी कोई धार्मिक अनुष्ठान होता था, कीर्तन मंडली भक्ति की ज्योत जगाने वहां पहुंच जाती थी। लोग उन्हें कुछ ले-देकर कृतार्थ का अनुभव करते थे। लेकि न अब न तो वैसे लोग रहे और न वैसी प्रांजल अनुभूति की दमक। यही कारण है कि कीर्तन मंडली अब विलुप्ति के कगार पर पहुंच गयी है। बदलती मानसिकता की तपिश के बीच उसकी जगह बैंड पार्टियों का कनफोड़ू संगीत ने ले लिया है।     

     कीर्तन मंडलियों के गायब होने का एक कारण रोजगार के दबाव में गांव से शहर की तरफ पलायन भी है। कीर्तन मंडली में कम-से कम चार-पांच लोग अवश्य सम्मिलित होते थे। इतने लोगों का होना जरूरी था। बाकी साथ देनेवाले अन्य लोग तो आयोजन के दौरान अपने-आप मिल जाते थे। कीर्तन मंडली से जुड़े लोग गांव-घर में किसी-न-किसी छोटे-बड़े अन्य कामों से भी जुड़े होते थे। फुर्सत के पल में कीर्तन का अलख जगा आते थे। अब पलायन के कारण गांवों में एक साथ चार लोगों का रहना भी गंवारा नहीं है। एक उपस्थित रहता है तो दूसरा अनुपस्थित। ऐसे में कीर्तन का होना असंभव हो जाता है। ऐसा नहीं है कि कीर्तन मंडली में संगीत और आध्यात्म के बहुत बड़े जानकार लोग होते थे। बस काम भर अभ्यास के सहारे भक्ति के स्वर साध लेते थे। उनका गंवई अंदाज और  ज्ञान गुमान रहित सहजता ही बरबस मन को सम्मोहित करती थी। गांव में आकर शहर के बसने से धीरे-धीरे कीर्तन मंडली की तरह हमारी कई प्रमुख सास्कृतिक परंपराएं भी विलुप्त होती जा रही हैं। समय चक्र से बच कर उन्हें संवेदनशीलता के साथ


Saturday, 18 July 2015

एक नये कैनवास पर मनुष्य को देखने की चेष्टा




प्रणव प्रियदर्शी
मनुष्य की प्यास क्या है? वस्तुतः वह क्या चाहता है? क्या सचमुच में वह जो चाहता है, वही उसकी प्यास होती है? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जिनके जवाब ढूंढ़ने में पूरी उम्र खफ जाती है, फिर भी उत्तर नहीं मिल पाते। सदियाँ गुजर जाती हैं, सभ्यताएँ रीतती जाती हैं और मनुष्य हर बार वहीं खड़ा मिलता है, जहाँ से उसकी यात्राएँ शुरू हुई थीं। दरअसल, हमारी चाहतों के भीतर भी कुछ ऐसी चाह छिपी होती है, जिस तक पहुँचने के लिए बहुत गहरी समझ और व्यापक दृष्टिकोण की जरूरत पड़ती है। उस तक पहुंचने के लिए हमें संसार के बने-बनाये दायरे, मान्यताएँ, अपेक्षाएँ और उम्मीदों से ऊपर उठ कर मुक्त आकाश के सामने आकर खड़ा होना होता है। जहाँ शास्त्र, सिद्धांत और संस्कृति को बिना बीच में लाये ‘मैं’ को ‘मैं’ की नजरों से देख पाने में हम सक्षम हो सकें और चेतना के उस उजास में छिटकी अनुभूति पर विश्वास कर सकें।
       कवि विमलेश त्रिपाठी का उपन्यास ‘कैनवास पर प्रेम’ उस मुक्ताकाश के सामने लाकर खड़ा करता है और उससे उत्पन्न अनुभूति पर अडिग रहने का संबल भी प्रदान करता है। कवि विमलेश त्रिपाठी इसलिए कि इस उपन्यास में उनकी काव्य चेतना ही प्रगट हुई है। तथाकथित कहानीकार किसी घटना को शुष्क शब्दों में पिरोकर पाठक के सामने उसे परोसने में ही अपनी प्रतिभा की पराकाष्ठा समझ लेते हैं। हकीकत यह है कि बिना काव्यानुभूति के साहित्य की कोई भी विधा अपनी पूर्णता के मापदंड पर खड़ी नहीं उतर सकती। विमलेश त्रिपाठी कविता तो लिखते ही हैं, कहानी में भी एक घटना को दूसरी घटना से जोड़ने और उसके साथ कई संदर्भों को बुनने में इन्हें महारथ हासिल है। इस उपन्यास को पढ़ते हुए सहज ही ऐसा महसूस किया जा सकता है। कैनवास पर प्रेम शीर्षक से स्पष्टतः यह परीलक्षित होता है कि उपन्यास में प्रेम को अभिव्यक्ति मिली होगी और ऐसा है भी। प्रेम के साथ परेशानी यह भी है कि उसकी अभिव्यक्ति अगर काव्यात्मक शैली में न की गयी तो वह कुछ और ही अर्थ ग्रहण कर लेता है। लेखक को यह बात अच्छी तरह से पता है। इसलिए उपन्यास में जहां-जहां संदर्भ के अनुसार काव्यात्मक शैली की जरूरत पड़ी है, उन्होंने वहाँ से खुद को चूकने नहीं दिया है। यही कारण है कि यह उपन्यास पठनीयता के साथ प्रवाह भी बनाये रखता है और मन-मस्तिष्क पर अलग छाप छोड़ता है।
       अक्सर ऐसा देखा जाता है कि प्रेम के बहाने अश्लीलता को पड़ोस कर सस्ती लोकप्रियता बटोरने के फिराक में आज का लेखक लगा रहता है। इस उपन्यास में बहुत जगह ऐसी संभावनाएँ और संदर्भ बनते हैं, जिन्हें सेक्सुअल खुराक में तब्दील किया जा सकता था, लेकिन रचनाकार ने ऐसा नहीं होने दिया। जॉनस एरिकसन का एक कथन मुझे याद आ रहा है-‘बेचने के लिए नहीं बताने के लिए लिखें’। यह उपन्यास वृहतर उद्देश्य, प्रेम की दिव्य और पवित्र अनुभूति के साथ रचा गया है। यही कारण है कि उपन्यास का मुख्यपात्र सत्यदेव अपनी प्रेमिका में माँ की भूली-बिसरी, धुँधली तस्वीर को मुखर होता हुआ पाता है। प्रेमी-प्रेमिका का समागम दैहिक मिलन न होकर दैविक हो जाता है। उपन्यास में कुछ बानगी के साथ काव्यात्मक चेतना का सजल प्रवाह भी देखिए-
        “एक शांत और उजली नदी थी-जिसके अंदर मैं डूब रहा था। एक ऐसी नदी, जिसमें पहली बार डूबते हुए भी डूबने के डर से अलग था। यह डूबना एक नये रहस्य लोक की यात्रा थी-जो अनजान और एकदम नया था-अचंभित करनेवाला और अप्रत्याशित। वह एक बार दर्द से कांपती और उसके कंपन को सहेजता हुआ मैं दुनिया का सबसे बड़ा विजेता महसूस कर रहा था। दूर कहीं पहाड़ पर ग्लैशियर पिघल रहे थे। कहीं तेज बारिश हो रही थी-एक जोड़ की आँधी उठी थी। उस आँधी में दो शरीर उड़कर किसी देवलोक तक पहुँचने की यात्रा कर रहे थे-दो आत्माएँ एक-दूसरे में अंतरित होकर नया जन्म ग्रहण कर रही थीं।’’
        “मैं कैनवास पर कूची से रंग भर रहा था। एक तस्वीर जो हिल रही थी-काँप रही थी और अपने दैवीय रूप में रंगों के बीच पवित्र हो रही थी, उसी तस्वीर के बीच मैं तस्वीर की शक्ल में जा मिला था। दो तस्वीरें साथ मिलकर एक तस्वीर हो गयी थीं और पूरी दुनिया में एक असंभव किस्म का रंगीन उजाला फैल गया था। बहुत देर के लिए...और शायद उस एक वक्त में सदियों के लिए...।”
         “मेरे अंदर कोई एक तूफान-सा उठा था-जिसको ठीक-ठाक बताने में मैं असमर्थ हूँ, लेकिन मैंने तब अपने होंठ उसकी गीली आँखों पर रख दिये थे-बहुत देर तक। जैसे एक गहरा रंग कागज पर जाकर एक सुंदर आकृति में ढल गया हो और वह रंग धीरे-धीरे दो होठों की शक्ल में बदलता गया हो-दो होंठ मिलकर एक नए रंग का नया चित्र आँक रहे हों। बहुत देर तक। अनबद्य और अशेष। और उस दिन वह लौट रही थी। एक नया चित्र बना था हमारे और उसके बीच की थोड़ी-सी जमीन पर। भाषा चूक गयी थी। सिरफ उसका खामोश लौटना हवा में गूँज रहा था-वह जा रही थी और मुझे लग रहा था कि बहुत दिनों बाद वह मेरे और पास और करीब आ रही थी।”
         हमारा समाज प्रेम की इजाजत नहीं देता, लेकिन प्राणों की प्यास और तलाश अंततः प्रेम के रूप में ही प्रगट होती है। यह मनुष्य की चेतना का सांस्कृतिक परिष्कार है। इसलिए मन की उदीप्त आकांक्षा और नैसर्गिक उहापोह के अधीन हो आदमी प्रेम तो कर बैठता है, लेकिन उसे मंजिल तक पहुँचाने में सभी कामयाब नहीं हो पाते। ऐसे मोड़ पर भी नहीं, जहाँ प्रेम घने पेड़ की तरह अविचल खड़ा हो और उससे आती हवा पूरे जीवन को अपनी बाँहों में समेट लेने का निमंत्रण देती हो। जीवन में असफलताओं का आना कोई नयी बात नहीं है। कुछ असफलताएँ हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं तो कुछ जीने का उत्साह ही खत्म कर देती हैं। जब असफलता जीने का उत्साह खत्म कर दे तो गतिशील संसार में भी हमारे लिए चारों तरफ एक धूसर सन्नाटा फैल जाता है। कई दिनों तक ऐसी ही भावदशा बनी रहने पर मन की जो सहज प्रक्रिया है, वह निष्क्रिय होकर आदमी को एक अलग ही उलझन में डाल देती है। ऐसी स्थिति से निजात पाना फिर असंभव-सा लगने लगता है।
        उपन्यास का मुख्य पात्र सत्यदेव का व्यक्तित्व इसी कारण अधिक जटिल है। इन जटिलताओं के भीतर दबी पड़ी संवेदनाओं की परतों को उघाड़ पाना बहुत कठिन काम है। बहुत ही मनोवैज्ञिनक ढंग से लेखक ने एक अनसुलझे व्यक्तित्व के एक-एक सिरे को सुलझाया है। अक्सर हम अपने संकीर्ण समझ व असमर्थता के
वशीभूत हो ऐसे व्यक्ति को पागल घोषित कर निश्चिंत हो जाते हैं। हम पागलों के व्यक्तित्व के बीहड़ जंगल के भीतर  संवेदनाओं की बहती नदी को खोजने की कोशिश नहीं करते। शायद इतिहास में ऐसा कभी हो पाता, तो पागलखाने में इतनी भीड़ नहीं उमड़ती। यह उपन्यास मनुष्य के एक नये मनोविज्ञान को खोजने के लिए प्रेरित करता है।
        लेखक ने कई जगहों पर यह संकेत भी दिया है कि अगर उनके भीतर कहानीकार की प्रेरणा न होती तो ये सब संभव नहीं हो पाता। यह उपन्यास इसलिए भी रोचक और अनुकरणीय बन पड़ा है कि इसमें कहानीकार की विवशता, श्रम, धैर्य और व्यक्तिगत उहापोह सबकुछ एकसाथ प्रगट हुआ है। ये सब कहानी के साथ-साथ चलता है। उपन्यास का मुख्यपात्र सत्यदेव को ही नहीं, उसके आसपास के एक-एक पात्र को भी लेखक ने बहुत करीने से गढ़ा है और उस पर सतर्कता के साथ मेहनत की है। अगर ऐसा न होता तो कहानी किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाती, क्योंकि सत्यदेव के आसपास गढ़े गये अन्य पात्र भी प्रेम की खालिश वेदना से व्यथित हैं। लेकिन वे किसी-न-किसी रूप में दुनिया से सामंजस्य बिठाए हुए हैं। भले ही उनकी आँखों में सूनापन और हृदय में अथाह मौन पसरा हुआ है। सत्यदेव ऐसा नहीं कर पाता। जब हम दुनिया से सामंजस्य नहीं बिठा पाते हैं तो
वह हमें धकेल कर आगे बढ़ जाती है। साहित्य ही है, जो यहीं से रचना का मर्म ढूंढ़ लेता है।
        लेखक ने उपन्यास में कला के द्वंद्व को भी समेटने का प्रयास किया है। कौन पढ़ता है साहित्य, क्यों पढ़ेगा, लोगों के पास अब समय कहाँ है? सुबह आठ से शाम आठ बजे तक दफ्तर। इसके बाद बच्चे-कच्चे, दुकान-दउरी और पत्नी की चख-चख। फिर भी सत्यदेव शर्मा ने बहुत सारी चीजों के बीच से पेंटिंग को क्यों चुना? कोई एक आदमी लेखन को क्यों चुनता है? कथाकार कहता है-असल में यह प्रश्न पूछना ही बेमानी है। कहना चाहिए और पूछना बहुत जरूरी हो तो पूछना चाहिए कि इतने लोगों के बीच से पेंटिंग ने सत्यदेव शर्मा को क्यों चुना या लेखन ने विमल बाबू को क्यों चुना? बावजूद इसके प्रश्न यह भी उठता है कि प्रेम पर इतनी सारी कहानी और कविताएँ लिखी गयी हैं, फिल्में बनी हैं, फिर प्रेम पर एक नयी पुस्तक क्यों? लेखक अपने पात्रों के माध्यम से इन बातों का जवाब बड़े ही खूबसूरती से देते हैं-
       “-मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती?
        यह एक ऐसा वाक्य था, जिसे सैकड़ों-हजारों लड़कियों ने सैकड़ों-हजारों बार अपने पसंद के लड़के के सामने दुहराया है, लेकिन फिर भी इसकी गंभीरता कम नहीं हुई थी। ...एक ऐसा आवेग उठा था मेरे अंदर कि मैंने उसे कसकर अपनी बाँहों में जकड़ लिया था और जो मैंने कहा था, वह भी एक बहुत बार दुहराई गयी बात थी। लेकिन उस समय उसकी पवित्रता के प्रति मैं उतना ही आश्वस्त और विश्वस्त था जितना कि आपके जैसा कोई लेखक हो सकता है या कोई एक इंसान जो सच पर यकीन रखता हो-जिसे समय के थपेड़ों ने मुर्दा न कर दिया हो।
       “ -मैं तुम्हें प्यार करता हूँ।
      यह वाक्य हमारे बीच से होकर आकाश की ओर उड़ गया था-बिलकुल उस रंगीन तितली की तरह, जिसे बचपन से हम दोनोंपकड़ने की कोशिश करते खेतों में भटकते रहते थे। हवा में एक गूँज थी, जिसकी थर्राहट अंतरिक्ष तक पहुँच रही थी। और धरती पर दो मिट्टी के पुतले एक-दूसरे से गुँथे हुए एक नयी कविता लिख रहे थे-जिसका अर्थ इस देश के असंख्य लोगों को आज तक समझ में नहीं आया है’’।
      कथा का कोई अंत नहीं होता। एक कथा खत्म होती है और वहीं से दूसरी कथा चल पड़ती है। इसलिए मैं अपेक्षा करूँगा कि साहित्य में इस तरह की रचनाओं को बेझिझक प्रश्रय मिले, ताकि सभ्यता की संभावनाओं का नया द्वार खुल सके।