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Sunday, 16 February 2014

वेलेंटाइन डे : मौसम ने भी पुकारा, युवाओं ने प्रेम निभाया


प्रणव प्रियदर्शी
रांची. वेलेंटाइन वीक अर्थात प्रेम को समर्पित एक पूरा सप्ताह. एक-एक को अलग-अलग अंदाज में मनाने की चुहल. और फिर अंतिम छोड़ पर वेलेंटाइन डे, यानी एहसास के किसी कोने में बची-खुची सारी कसक को संवार लेने का एक अवसर. महानगरों की संस्कृति की ओर तेजी से बढ़नेवाले रांची के युवक भला ऐसे अवसर को हाथ से कैसे फिसल जाने देते. उस पर से मौसम का आशिकाना अंदाज, फगुनाहट का आगाज और वसंत का साथ इन्हें उलफत के रंगों में रंगने को विवश कर रहा था. शुक्रवार को मौसम में अचानक हुए परिवर्तन, इन्हें प्रेम निमंत्रण लग रहा था. घर में बैठे, अपने ही धुन में खोये-अलसाये प्रीत पगा मन जब खिड़की का पर्दा उठाया, प्रकृति के अंदाजे बयां पर चौंक उठा. उन्हें लगा कि मौसम भी पुकार रहा है. अब जान हथेली पर क्यों न लेना पड़े, मिलने जाना ही पड़ेगा. झट तैयार होकर बाहर निकले. सामने हमराज को पाकर उनके मन की हसरतें और हरारतें समय पर अमिट लकीड़ खींच देना चाहती थीं. प्रेमी जोड़े एक-दूसरे के हाथों में थामे हाथ जब एक कदम बढ़ाते, सिसकती हवा पास से गुजरती और ये सिमटने को तैयार हो जाते. कदम थमते कि किसी फूलों की झुरमुट से निकल कर आयी कोई स्वप्निल सुगंध इन्हें मदहोश कर जाती. जैसे ही पीछे मुड़ कर कुछ खोजते कि फागुनी चंचलता इनके शरीर को झनझना जाता.
   भारतीय संस्कृति में भी प्रेम निमंत्रण और इसकी अभिव्यक्ति का स्थान है. लेकिन इसे किसी दिन विशेष के रूप में मनाने की परंपरा यहां नहीं रही है. यहां प्रेम के लोकरंजक नहीं, व्यक्तिपरक स्वरूप की प्रधानता है. ऐसा इसलिए कि हमारी जीवन पद्धति और पारिवारिक पृष्ठभूमि सामूहिक नैरंतर्य को साथ लेकर चलती है. परंतु, अब जबकि हम हर स्तर पर अपने चिरंतन मूल्य से ही कटते जा रहे हैं; तो हमारी जीवन शैली में वेलेंटाइन डे की प्राथमिकता आ जुड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं. इस बीच जब निरंकुश बाजार भी अपना रास्ता बना कर अहसासों का आखेट करने लगे तो उसे कैसे रोका जा सकता है! प्रेम को महसूसने और उसे जीने की जो विशिष्ट संवेदना भारतीय मानस के अंदर सदियों से संजीवित है, उसके स्वरूप में कोई अंतर नहीं आया है. इसी के बल पर तो वह अपनी अंतरात्मा से अभी भी अपनी तरह हैं, भले ही कोई लाख पश्चिमी अवधारणा की दुहाई दे. भारतीय युवा वेलेंटाइन डे मना कर प्रेम को और भी किसी विशिष्ट अनुभूति से जोड़ देते हैं. हमारी जीवन संरचना में बिना वेलेंटाइन डे के भी क्षण-क्षण प्रेम ध्वनित होता है और पग-पग पर एक प्रेम कहानी मिलती है.
   भारतीय संस्कृति की दुहाई देकर वेलेंटाइन डे के विरोध के नाम पर जो कुछ किया जाता है, वह तो भारतीय चेतना को और भी आहत करनेवाला है. यहां विद्रोह भी प्रेम से किया जाता है. नवीन मूल्य स्थापित करने के लिए किया जाता है. पर मूल्य के नाम पर जिनके पास कुछ भी नहीं है, वह समूह बना कर प्रेमी जोड़े पर हमला करते हैं और अपनी करतूतों पर शर्मसार होने के बदले खुशी से झूम उठते हैं. तात्कालिक सुर्खियां उन्हें मिल जाती हैं और इसे अमूल्य निधि समझ लेते हैं. यही कारण है कि इनकी मनाही के बावजूद रांची के युवाओं ने पार्कों सहित अन्य कई जगहों पर वेलेंटाइन डे मनाया. दिक्कतें हुर्इं, सजा भी मिली, फिर भी उत्साह पर आंच नहीं आने दी.

Thursday, 2 January 2014

नव वर्ष तुम्हारा अभिनंदन!


प्रणव प्रियदर्शी
रांची : टिक...टिक...टिक...टिक करती घड़ी की सूई. सभी की आंखें टंगी हुर्इं. जैसे-जैसे घड़ी की सूइयां आगे बढ़तीं, लोगों की धड़कनें तेज होती जातीं. नव वर्ष को नव उत्साह के साथ नये भावावेश में जीने की उम्मीदें हिलोरें मारतीं. जैसे धैर्य का एक युग, जैसे एक जंगल फड़फड़ाहट का. जैसे ही घंटा, मिनट और सेकेंड की सूइयां हमआगोश होकर 12 पर थमीं, सब्र का बांध टूटा. हवा में एक तल्खी इस राग के साथ बिखर गयी कि अब तुम आ गये हो, नहीं कर सकते और तुम्हारा इंतजार! छत के नीचे टेलिफोन और मोबाइल की अलग-अलग धुनें गूंजने लगीं. बाहर सर्द सन्नाटे को चीरती पटाखे की ध्वनि से पूरा वातावरण आह्लादित हो उठा. शहर के सारे नामचीन होटल, क्लब, बार, रेस्तरां, पार्क संगीत के सरगम पर थिरकने लगे. वाह! कितना मादक क्षण था वह! बिछोह के क्षण पर आगमन का उत्साह देखते ही बन रहा था. एक उक्ति सटीक बैठ रही थी-आधे प्याले में शराब, मगर खाली नहीं था बाकी का आधा, वह गुम हुआ मदहोशी में.
     बीते वर्ष में हमने क्या गंवाया-क्या समेटा, इस चिंतन की शालीनता शाम ढलते ही ढल गयी. बारहा, सर्द-स्याह रात में चादर में सिमट कर लोग छत पर पहुंच रहे थे. नव वर्ष की खुशी में शुमार हो इंतकाम की सारी हदें पार कर देना चाहते थे. दूसरी तरफ घर में बैठे लोग टीवी के माध्यम से विभिन्न कार्यक्रमों का लुत्फ उठा रहे थे. वहीं, कुछ सुबह के इंतजार में पलकें बिछाए हुए थे. पिकनिक स्पॉट पर जाने के लिए तरह-तरह की योजनाएं बन रही थीं. माहौल की सरगोशी शब्दश: इस बात को बयां कर रही थी कि मनुष्य कहीं नहीं जाता, हर चीज मनुष्य तक आती है, जैसे कल, जैसे नव वर्ष.
     इन सारे मंजर से बेफिक्र हो अनागत-आगत के क्षण पर ठहर कर कोई विरही मन कह रहा था कि कोई दस्तक दे रहा है दरवाजे पर. कितना निराशाजनक है यह. कि तुम नहीं, नया साल आया है. समय की नब्ज पर हाथ रखनेवाले कुछ लोग नव वर्ष से ही संवाद करने में लगे थे. वे कह रहे थे कि अपराधियों की खूनी वारदातें, आततायियों के काले कारनामे, फितरतियों की फिराकपरस्ती और ऐयासों के कायर कहकहे. यदि तुम्हारे पास इतना ही कुछ बचा है; हमारे उत्साह को समय का सौगात देने के लिए, तो तेरे आने-जाने का क्या अर्थ रह जाता है? किस उत्कर्ष की कामना लिये हम तुम्हारा स्वागत करें. और किस संभावना के लिए करें तुमारा अभिनंदन! इसलिए तो कहता हूृं; इतिहास के इंसाफ से पहले कुछ कर सकें हम, कुछ कर सको तुम, तो आओ नव वर्ष. तुम्हारे आने का लाख-लाख वंदन है! अभिनंदन है!!

Wednesday, 18 December 2013

बयान बहादुरी के बदले काम और भी हैं...

प्रणव प्रियदर्शी
रांची : झारखंड सरकार में कांग्रेस के मंत्री बयान बहादुर हैं. ये बात पूरी यकीन के साथ कहा जा सकता है. फिर भी किसकी मजाल कि इन्हें कोई किसी और काम की नसीहत दे. जब कांग्रेस अलाकमान की मर्जी को भी यहां शिकस्त दे दिया जाता है तो किसी और के क्या कहने! प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत और झारखंड प्रभारी बीके हरिप्रसाद की लाख मिन्नतें, आरजू और आदेश के बावजूद स्थिति जस की तस है. रूठने-मनाने का मुहूर्त बार-बार निकल आता है और जनाकांक्षाओं का सूरज छिप जाता है. कभी गधे को गुलकंद वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है तो कभी थोथा चना, बाजे घना का राग उभर अता है.
अभी झारखंड की सियासत में विभागीय अफसरों को आड़े हाथों लेने का नया प्रचलन शुरू हुआ है। भला इसमें विवादों से चोली दामन का साथ रखनेवाली शिक्षा मंत्री गीताश्री भी पीछे क्यों रहे! मियां की जूती, मियां के सिर। उन्होंने वरिष्ठ आइएएस आॅफिसर व योजना विकास सचिव डीके तिवारी को चपेटे में ले लिया. वह भी अनुसंधान और समीक्षा की पहलुओं में गोता लगाये बिना. उन्होंने सबसे पहले तो उनपर भाजपा के करीबी होने का आरोप लगाया. वहीं, दूसरी तरफ पारा शिक्षकों की फाइल पर कुंडली मार कर बैठने की बात कही. पहला आरोप उनकी व्यक्तिगत संकीर्णता का परिचायक है तो दूसरा आरोप उनकी पीडि़त मानसिकता का. मीडिया रिपोर्टों से खुलासा भी हो चुका है कि पारा शिक्षकों के मानदेय वृद्धि से संबंधित फाइल 29 अक्टूबर से ही मुख्यमंत्री सचिवालय में पड़ी है. उनके इस कारनामे से फिर कांग्रेस के माथे पर लकीर उभर आयी है. पार्टी कहती है कि कांग्रेस का एजेंडा लागू करने के लिए सरकार पर दबाव बनायें. लेकिन मंत्रियों का सुर्खियों में बने रहने का एजेंडा सब मट्यामेट कर देता है. कांग्रेस के मंत्रियों के फसाने और भी हैं. ग्रामीण विकास मंत्री ददई दुबे विभागीय सचिव के बदले जाने बिफर पड़ते हैं. मन्नान मल्लिक की कौन कहे वे तो कैबिनेट बंटवारे पर ही तन जाते हैं और मुख्यमंत्री को ही अलोचना के घेरे में ले लेते हैं. पश्ुपालन मंत्री योगेंद्र साव ताल ठोंक कर आईजी आरके मल्लिक और रांची एसपी साकेत सिंह के तबादले का श्रेय लेते हैं. 58 हजार का पेट्रोल जबरन भरवा कर होठ पसाड़ कर बेगुनाही का बयान दे देते हैं. डीएओ (जिला कृषि पदाधिकारी) के पास पेट्रोल पंप का नोटिस आता है और वह माथा पकड़ लेते हैं. पार्टी पीछे-पीछे अती है. जांच-पड़ताल की बात करती है. कार्रवाई का भरोसा देती है. दिन बीतते हैं और सभी सिरहाने सिमट जाते हैं.
इन्हें विधानसभा अध्यक्ष से सीखनी चाहिए कि उन्होंने प्रोटोकॉल के मामले पर अपनी सुरक्षा लौटायी. फिर आलाअधिकारियों के साथ बैठक की. उसके बाद बयान दिया. अपनी नाराजगी को तर्कसंगत पहलुओं से हल करने के बाद कहा कि सिर्फ सीएम की ही सुनते हैं अफसर. उन्होंने अधिकारियों की बातें भी स्वीकारी कि अध्यक्ष का प्रोटोकॉल यहां तय नहीं है. उन्होंने कहा कि जब प्रोटोकॉल ही तय नहीं है तो इस पर क्या कहना! उन्होंने जिलों में प्रोटोकॉल के उल्लंघन का मामला उठाया था. सुरक्षा को लेकर सवाल नहीं उठाया था. अब विस अध्यक्ष ने बिहार विधानसभा को पत्र लिख कर सुरक्षा के संदर्भ में जानकारी मांगी है.
कांग्रेस के मंत्रियों से लेकर पार्टी तक को यह समझना होगा कि अब फाकामस्ती से काम नहीं चलेगा. जनता का मिजाज बदल चुका है. उसे नित नूतन बयानों की फितरत से नहीं फुसलाया जा सकता. अपना ठीकरा दूसरे के सिर फोड़ने से बात नहीं बनेगी. नहीं तो झारखंड में भी कहीं वही हश्र न हो जाये जो मध्यप्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में हुआ. आगे लोकसभा की रणभेड़ी बजनेवाली है. झारखंड में अब आम अदमी पार्टी भी अपनी भुजाएं उठा रही है. नये-नये कार्यकर्ता जुड़ कर इसकी सबलता सुदृढ़ कर रहे हैं. इसलिए झारखंड की सियासत को आधा तीतर आधा बटेर जैसी स्थिति से उबड़ कर अपनी करनी पार उतरनी जैसे हर्फ गढ़ने होंगे.