Wednesday, 14 August 2013

कोई हमें भी बताये देश प्रेम होता है क्या?


प्रणव प्रियदर्शी
स्वतंत्रता दिवस का नाम जेहन में गूंजते ही एक अलग ही रोमांच और खुशी से मन इठला उठता है। ऐसा किस कारण से होता है? कभी सोचा है हमने? स्वतंत्रता शब्द के स्वाद से या फिर दिवस के अनुराग से? स्वतंत्र फिजां में सांस लेने से या फिर किसी त्योहार के आगाज से? रविवार के अलावा सप्ताह में एक और छुप्ती जुड़ने के उत्साह से? वजह कई हो सकते हैं, लेकिन एक वजह शायद ही किसी के मन कुहुक उठती हो। वह ये कि स्वतंत्रता दिवस एक ऐसा महत्वपूर्ण दिन है, जिस दिन हमें मौका मिलता है अपने वीर शहीदों के अनुग्रह में नतमस्तक होने का।
     विडंबना यह है कि नतमस्तक होने पर भी सिर्फ हमारा मस्तक ही झुकता है, मन नहीं झुकता। और मन को झुकाने के लिए हम कोई पहल भी नहीं करते। आखिर करें भी कैसे? क्योंकि हमें न खुद से प्यार है, न अपनी जिंदगी से। जिस आबोहवा में रहते हैं, जिस सरोकार में सांस लेते हैं, उससे न कोई लगाव है। भारतीयता या राष्ट्रवाद क्या होता है, न उस तरफ कोई झुकाव है। हमें न अपनी संस्कृति का कोई मलाल है और न ही अपनी सामाजिक जीवन पद्धति से कोई आकर्षण। हमें अपनी विरासत के प्रति न मोह है और न भविष्य के प्रति कोई दृष्टि। 
       इसी का नतीजा है कि अभी स्वतंत्रता दिवस का समय है और पाकिस्तान ने जम्मु-काश्मीर के पुंछ में षड्यंत्र कर हमारे पांच जवानों की हत्या कर दी। जिसमें चार जवान बिहार के ही थे। पाकिस्तान के प्रति पूरे देश में आक्रोश दिखा। लेकिन बिहार ने सामूहिक रूप से इनके प्रति अनुग्रह का भाव नहीं दिखाया। उनके शव को जब पटना हवाई अड्डे पर लाया गया तो सत्ताधीन सरकार के किसी भी मंत्री को इतनी भी फुर्सत नहीं थी कि उनका सादा स्वागत भी कर पाते। इस कारगुजारी के बारे में जब उनसे पूछा गया तो उल्टे पूछनेवाले पर ही बरस पड़े। आक्रोश में मन का दबा रंग बाहर छिटक ही जाता है। ऐसा हुआ भी। तीन मंत्रियों के छिटके रंग ने सरकार का रंग उतार दिया। वे हमारे ही द्वारा चुने गये प्रतिनिधि हैं। उनके रंग में भी तो हमारा रंग घुला है। वे हमारे ही अच्छे-बुरे रंग का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए उनके दिये गये बयान के मर्ज को अपने मन के तराजू पर भी तौलना जरूरी है। मंत्रियों ने कोई नयी बात नहीं कही। उन्होंने हम सबकी बात कही है। देश प्रेम के नाम पर हमारे-आपके मन में क्या चलता है, उसका भेद खोला है।
      ग्रामीण विकास मंत्री भीम सिंह ने कह डाला- 'जवान शहीद होने के लिए ही होते हैं। लोग सेना और पुलिस में नौकरी क्यों लेते हैं?' भीम सिंह ने भीम की तरह मोटी बात कही। हम साधारण जन में भी क्या शहीदों के लिए ऐसी ही भावना नहीं है? सेना और पुलिस की नौकरी में सभी देश प्रेम से आप्लावित होकर ही तो नहीं जाते। अधिकांश के लिए ऐसी नौकरी देश सेवा नहीं विवशता है। इस तरह की नौकरी में हर समय मौत मौके के इंतजार में खड़ी रहती है, फिर भी रोटी की विवशता उससे टकरा देती है। अगर सिर्फ सेवा भाव से लोग इस ओर जाते तो नौकरी शब्द सेना और पुलिस के लिए अपमानित शब्द होता। 
     इसके बाद बिहार के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह ने पाकिस्तान का पक्ष लिया था। उन्होंने शहीद जवानों के परिजनों के अनशन को नाटक बताया था। क्या हमारे देश में ऐसे लोग नहीं हैं, जो खाते तो इस देश का हैं, लेकिन पक्ष पाकिस्तान का लेते हैं? क्या हमारे देश में अनशन अपने स्वार्थलोलुप इच्छाओं को मनवाने के लिए नहीं किया जाता?
    बात से बात निकली और शहीद जवान प्रेमनाथ सिंह के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होने के बारे में बिहार के विज्ञान व प्रौद्योगिकी मंत्री गौतम सिंह ने कह डाला- 'क्या फर्क पड़ता है।' गौतम बुद्ध तो ये है नहीं कि इनकी बातों को अनासक्ति की साधना से उत्पन्न मध्यमा, बैखरी मान लिया जाता। बुद्ध की जगह सिंह हैं, इसलिए तूफान मचना ही था। लेकिन उन्होंने क्या गलत कहा! जवानों के शहीद होने से देश में कितने लोगों की भावुकता लिरजती है? कितने को फर्क पड़ता है कि इसकी पड़ताल करे कि कबतक सीमा पर हमारे देश के जवान खून बहाते रहेंगे और प्रतिफल कुछ नहीं निकलेगा। जिनसे इनकी उम्मीद की जाती है, वे भी तो दुश्मनों का रहनुमा बन कर बैठे हैं।
      बजाहिर, हमें स्वतंत्रता दिवस एक अवसर प्रदान करता है। एक ऐसा अवसर कि हम विचार कर सकें कि देश प्रेम की भावना हमारे भीतर कैसे पल्लवित-पुष्पित हो सके? कैसे अपने चारों ओर के फूल-पत्तों, भाव-भंगिमा के प्रवाह में सम्मलित होकर अपने प्रेम को विस्तार दे सकें। कैसे हम स्वतंत्रता के मूल्य को समझ कर उसे आत्मसात करने की ओर बढ़ सकें। कि कैसे निढाल होती जिंदगी के बीच मरते सपनों के बीज को फिर से जगा सकें।

1 comment :

  1. बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
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