Wednesday, 18 February 2015

शक्ति का हनन कहां हो रहा है?




प्रणव प्रियदर्शी
आज का परिवेश इतने तरह की विकृतियों के साथ घुल-मिल गया है कि बुराई और अच्छाई का फर्क भी धीरे-धीरे मिटता चला जा रहा है। बुद्धिजीवी कहते हैं कि जितने तरह की बुराइयां अनगिनत रूपों में व्याप्त हैं, उन सबके निराकरण के लिए संविधान सम्मत नियम-कानून बने हुए हैं। प्रश्न उठता है कि क्या नियम-कानून बना देने से ही समाधान हो जाता है? अगर ऐसा है, तो फिर समस्याएं बढ़ती ही क्यों जा रही हैं? क्यों जिंदगी कई बार प्रश्नों में ही उलझ कर प्रश्नों के साथ ही दम तोड़ देती है।
अतीत की ओर झांकने पर ऐसा लगता है कि एक समुदाय एवं समाज को ढंग से चलाने के लिए कुछ नियमों की आवश्यकता अवश्य पड़ती है। मनुष्य ने जब संगठित रूप में रहना शुरू किया, तब से ही उसे कुछ नियम-कानून बनाने पड़े। उनका उल्लंघन होने पर दंड का भी प्रावधान करना पड़ा। ऐसा देखा जाता है कि एक ही परिवार में, एक ही परिवेश में रहने के बावजूद हर भाई-बहन अलग-अलग नियति से प्रेरित होते हैं। इसलिए एक ही दृष्टिकोण से हर किसी को आंकना सर्वथा सही नहीं होता। किसी को बात से ही चोट लग जाती है। कोई हल्के आघात से आहत हो उठता है। किसी को दंड दिये बिना सही रास्ते पर नहीं लाया जा सकता। कोई दंडित होने के बाद भी पहले जैसा ही बना रहता है। यही कारण है कि कानूनी दंड की व्यवस्था सर्वथा त्याज्य नहीं होती और न ही अनुकरणीय। द्रष्टव्य यह हो जाता है कि दंडित करनेवाले व्यक्ति की दृष्टि कितनी व्यापक अथवा संकुचित है? वह व्यक्ति भी कैसा है, जिसे दंडित किया जा रहा है?
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि दहेज के लिए कानून बनाये गये, लेकिन दहेज प्रथा खत्म नहीं हुई है। नारी मुक्ति संबंधी अनेक नियम-कानून बनाये गये हैं। अनेक संस्थाएं इसके नाम पर फलती-फूलती हैं, लेकिन नारी मुक्त नहीं हो पायी है। दुष्कर्म, अपहरण, यौन-शोषण और उत्पीड़न जैसी समस्याओं की लिस्ट बहुत बड़ी है। हाल ही में एक बच्चे की शिक्षक ने बेरहमी से पिटाई की। मीडियावालों ने इस घटना को बखूबी कवरेज दिया। ठीक दो दिनों बाद बाल अधिकार सुरक्षा आयोग का निर्देश समाचार पत्र के प्रथम पृष्ठ पर प्रथम समाचार के रूप में ही पढ़ने को मिला कि बच्चों को मूर्ख और बेदिमागी कहें, तो जेल जा सकते हैं टीचर। सोचनीय है कि क्या सिर्फ कानून बना कर ही अपने कर्तव्य और संवेदना से इतिश्री कर लेना, हमारे राष्ट्र के शुभचिंतकों की नियति बन गयी है अथवा रास्ते आगे और भी हैं? इस संघीय व्यवस्था में जब शक्ति का अंतरण राष्ट्र से लेकर पंचायत तक किया गया है, तब शक्ति का हनन कहां हो रहा है? कानून की मोटी-मोटी किताबें दिनानुदिन बढ़ती जा रही हैं। समस्याएं भी नये-नये आकार में सामने आ रही हैं। समस्या और समाधान में कोई तारतम्यता दिखने को नहीं मिलती है। आशंका, निराशा और यातना के माहौल में बार-बार एक अनबुझा तिनका आकर उलझ जाता है, जिससे परिस्थिति और भयावह हो उठती है। जब हम आधारभूत समस्याओं से ही नहीं उबर पा रहे हैं तो विकास की बात करना थोथी बयानबाजी ही होगी।
कुछ दिनों पहले ऐसी कुछ घटनाएं भी प्रकाश में आयीं और आती ही रहती हैं कि अपराधियों को रंगे हाथों पकड़ने पर आम लोगों ने उन्हें पुलिस के हवाले न कर अपने तरीके से दंडित किया। ऐसी घटनाएं उन व्यक्तियों के साथ कानून व्यवस्था पर भी प्रश्न चिह्न लगाती हैं। लोगों का विश्वास इस व्यवस्था पर से उठने लगा है। वे जानने लगे हैं कि जब राजनीति का ही अपराधीकरण हो गया है तो अपराध को अपराध कैसे समझा जायेगा? सरकारी तंत्र के अगुवा आम आदमी के प्रति प्रतिबद्ध न होकर अपने स्वार्थ की दीवार ऊंचा उठाने में लग गये हैं तो न्याय कैसे मिल पायेगा? समय की मांग है परिवेश को नूतन आयामों से संपृक्त कर नया जनमत बनाया जाए।

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