Tuesday, 1 October 2013

मजधार है, भंवर है और दूर है किनारा

प्रणव प्रियदर्शी
सीबीआइ की विशेष अदालत ने सोमवार को राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और जगन्नाथ मिश्र समेत सभी 45 आरोपियों को दोषी करार दिया। यह चारा घोटाला से जुड़े सबसे बड़ा मामला था। अपने चुटीले अंदाज से वातावरण को खुशनुमा बनानेवाले लालू यादव इसबार रांची आगमन के समय से ही धीर-गंभीर थे। इस धीरता-गंभीरता में निराशा से उपजा सन्नाटा था। यह कोर्ट के फैसले के बाद मुखर हो उठा। लालू यादव ने जज से कहा कि जब आपने दोषी ठहरा ही दिया है तो सजा पर सुनवाई भी अभी ही कर लीजिए। हालांकि, जज ने लालू की मांग को खारिज करते हुए उन्हें हिरासत में लिये जाने का आदेश दे दिया। सजा तीन अक्टूर को सुनायी जायेगी। इस मामले में लालू यादव को तीन से सात साल तक की सजा हो सकती है। फैसले के बाद लालू यादव को सीधे बिरसा मुंडा जेल भेज दिया गया। 
             चारा घोटाले में दोषी करार दिये जाने के साथ ही लालू का राजनीतिक भविष्य खत्म होने की अटकलें शुरू हो गयी हैं। सुप्रीम कोर्ट के हाल में आये फैसले के मद्देनजर राजद सुप्रीमो के सामने लोकसभा सदस्य के रूप में अयोग्य ठहराये जाने का तत्काल खतरा पैदा हो गया है। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि अगर किसी सांसद या विधायक को किसी अदालत द्वारा दो साल या इससे अधिक की सजावाले किसी अपराध में दोषी ठहराया जाता है, तो वह तत्काल अयोग्य माना जायेगा। 
             संभावना इस बात की भी है कि वह अगला लोकसभा चुनाव भी नहीं लड़ पायेंंगे। लालू यादव की निराशा इन्हीं सब संभावनाओं के मद्देनजर ही होगी। और इन सारी संभावनाओं के पीछे है 27 सितंबर को राहुल गांधी का वह बयान, जिसमें उन्होंने कहा था कि दागी नेताओं से संबंधित सरकार द्वारा लाया गया अध्यादेश पूरी तरह बकवास है और इसे फाड़ कर फेंक देना चाहिए। यदि राहुल ने पिछले हफ्ते दोषी सांसदों को बचानेवाले अध्यादेश के खिलाफ अपनी राय नहीं दी होती तो अब तक अध्यादेश पर दस्तखत हो गये होते और उनकी सीट बच गयी होती। मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा ने राहुल के कारनामे के एक दिन पहले ही राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से मुलाकात कर इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर नहीं करने का आग्रह किया था। इसके बाद राष्ट्रपति ने इस अध्यादेश के बारे में स्पष्टीकरण लेने के लिए कानून मंत्री कपिल सिब्बल और गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे को तलब किया था।
             भाजपा लालू यादव को सजा मिलने से उत्साहित है। इस उत्साह का आभार उन्हें सबसे पहले राहुल गांधी को ही देना चाहिए। किसी मामले में एक ही राज्य के दो मुख्यमंत्रियों के एक साथ जेल जाने से भारतीय राजनीति   में शुद्धिकरण की शुरुआत मानी जा रही है। इसकी भी बलाइयां राहुल गांधी को ही मिलनी चाहिए। दरअसल शुद्धिकरण और शुचिता की शुरुआत निर्द्वन्द्व मन:स्थिति से ही हो सकती है। ऐसी ही मन:स्थिति और निर्विघ्न परिस्थिति के बीच राहुल गांधी ने दागी अध्यादेश के प्रति अपनी निजी राय व्यक्त की थी। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी बात कहने के लिए जो परिस्थिति चुनी, वह भी उस बात को कहने के लिए पूरी तरह उपयुक्त थी, वरना असर गहराई तक नहीं जाता। 
         राहुल गांधी ने प्रेस क्लब को उस समय चुना, जब कांग्रेस के संचार विभाग के प्रभारी अजय माकन इस क्लब में मीडिया को संबोधित कर रहे थे। इसी बीच राहुल ने खुद वहां आने का निर्णय लिया और मंच पर आते ही आनन-फानन में अध्यादेश के बारे में अपनी राय जाहिर कर सबको अवाक कर दिया। राहुल ने सबको सहज करने के लिए पहले माइक उठाते ही कहा, मैं कोई प्रेस कांफ्रेंस के लिए नहीं आया हूं। मैंने माकन जी को फोन मिलाया तो उन्होंने बताया कि आप उनसे अध्यादेश के बारे में सवाल पूछ रहे हैं। मैंने उनसे पूछा कि क्या लाइन ले रहे हो। उन्होंने मुझे पार्टी की लाइन बतायी। इसके बाद मैंने उनसे कहा कि मैं खुद ही आ रहा हूं और मैं अचानक यहां चला आया। राहुल गांधी ने कहा, अध्यादेश के बारे में मेरी निजी राय यह है कि यह पूरी तरह बकवास है और इसे फाड़ कर फेंक देना चाहिए। इसके पक्ष में तर्क यह दिया जाता है कि राजनीतिक कारणों से किया जा रहा है। उन्होंने कहा, हर पार्टी यही करती है, कांग्रेस यही करती है, भाजपा यही करती है, जनता दल, समाजवादी पार्टी सब यही करती हैं। मेरा कहना है कि मेरी पार्टी और बाकी सभी पार्टियों को इस तरह के समझौते नहीं कर इसतरह का बेहूदा निर्णय लेना बंद करना चाहिए।
          ऐसा कारनामा सिर्फ नायक जैसे फिल्म का नायक ही कर सकता है। असल जिंदगी में ऐसा इसलिए हुआ कि राहुल गांधी के भीतर सियासी दांव-पेंच के गुण नहीं आये हैं। वह अपनी कमजोरी भी समझते हैं और मजबूरी भी। राजनीति के तंग माहौल में वह अभी तक अपने-आप को समायोजित नहीं कर पाये हैं। उनके भीतर एक बेचैनी, एक छटपटाहट है; जो उनके युवा होने की प्रमाणिकता गढ़ती है। राहुल सियासत की दम तोड़ती अजान पर खुद को कुर्बान नहीं करना चाहते। लेकिन मजबूरियां हैं कि उनके पंख पकड़ लेते हैं। हालांकि भाजपा ने राहुल के इस कारनामे को नौटंकी करार दिया है, लेकिन सियासत के खिलाड़ी इसतरह की निर्दोष नौटंकी नहीं कर सकते। और यह कोई पहला मौका नहीं है कि राहुल के भीतर का मर्म जगा है। 
         याद कीजिए इसी वर्ष रविवार, 20 जनवरी का दिन जब राहुल ने सत्ता को जहर की संज्ञा दी थी। राहुल ने कहा था - आज सुबह मैं चार बजे ही उठ गया और बालकनी में गया। सोचा कि मेरे कंधे पर अब बड़ी जिम्मेदारी है। अंधेरा था, ठंड थी। मैंने सोचा कि आज मैं वह नहीं कहूंगा, जो लोग सुनना चाहते हैं। आज मैं वह कहूंगा जो मैं महसूस करता हूं। राहुल बोले, पिछली रात मेरी मां मेरे पास आयी और रो पड़ी, क्योंकि वो जानती हैं कि सत्ता जहर की तरह होती है। सत्ता क्या करती है। इसलिए हमें शक्ति का इस्तेमाल लोगों को सबल बनाने के लिए करना है। देश को राहुल जैसी ही मन:स्थिति और निष्कलंक काया रखनेवाले युवा नेताओं की जरूरत है।
ऐसी चर्चाएं इसलिए भी कि चर्चा है कि लालू के जेल जाने की स्थिति में उनकी पार्टी बिखर जायेगी। लेकिन लालू की दूरदर्शी सोच को पकड़ पाना सबके बस की बात नहीं। लालू जानते थे कि ऐसी स्थिति बन सकती है, इसलिए पहले ही वह अपने दोनों बेटे तेजस्वी और तेज प्रताप को राजनीति के मैदान में उताड़ चुके हैं। खुद राजद प्रमुख बहुत पहले ही यह संकेत दे चुके हैं कि उनकी गैरमौजूदगी में उनके बेटे पार्टी का नेतृत्व करेंगे। ये अलग बात है कि उनके पास कच्ची उम्र है और अनुभव की कमी है। राजनीति की पिच पर अपने पिता जैसा खिलाड़ी भले बन नहीं सकें, लेकिन राहुल गांधी का आदर्श तो है। 

No comments :

Post a Comment